Wednesday, December 2, 2009

शिरडी के साईं बाबा की महिमा

शिरडी के साईबाबा आज असंख्य लोगों के आराध्यदेव बन चुके है। उनकी कीर्ति दिन दोगुनी-रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। यद्यपि बाबा के द्वारा नश्वर शरीर को त्यागे हुए अनेक वर्ष बीत चुके है, परंतु वे अपने भक्तों का मार्गदर्शन करने के लिए आज भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान है। शिरडी में बाबा की समाधि से भक्तों को अपनी शंका और समस्या का समाधान मिलता है। बाबा की दिव्य शक्ति के प्रताप से शिरडी अब महातीर्थ बन गई है।
कहा जाता है कि सन् 1854 ई.में पहली बार बाबा जब शिरडी में देखे गए, तब वे लगभग सोलह वर्ष के थे। शिरडी के नाना चोपदार की वृद्ध माता ने उनका वर्णन इस प्रकार किया है- एक तरुण, स्वस्थ, फुर्तीला तथा अति सुंदर बालक सर्वप्रथम नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन दिखाई पड़ा। उसे सर्दी-गर्मी की जरा भी चिंता नहीं थी। इतनी कम उम्र में उस बालयोगी को अति कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। दिन में वह साधक किसी से भेंट नहीं करता था और रात में निर्भय होकर एकांत में घूमता था। गांव के लोग जिज्ञासावश उससे पूछते थे कि वह कौन है और उसका कहां से आगमन हुआ है? उस नवयुवक के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लोग उसकी तरफ सहज ही आकर्षित हो जाते थे। वह सदा नीम के पेड़ के नीचे बैठा रहता था और किसी के भी घर नहीं जाता था। यद्यपि वह देखने में नवयुवक लगता था तथापि उसका आचरण महात्माओं के सदृश था। वह त्याग और वैराग्य का साक्षात् मूर्तिमान स्वरूप था।
कुछ समय शिरडी में रहकर वह तरुण योगी किसी से कुछ कहे बिना वहां से चला गया। कई वर्ष बाद चांद पाटिल की बारात के साथ वह योगी पुन: शिरडी पहुंचा। खंडोबा के मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने उस फकीर का जब 'आओ साई' कहकर स्वागत किया, तब से उनका नाम 'साईबाबा' पड़ गया। शादी हो जाने के बाद वे चांद पाटिल की बारात के साथ वापस नहीं लौटे और सदा-सदा के लिए शिरडी में बस गये। वे कौन थे? उनका जन्म कहां हुआ था? उनके माता-पिता का नाम क्या था? ये सब प्रश्न अनुत्तरित ही है। बाबा ने अपना परिचय कभी दिया नहीं। अपने चमत्कारों से उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वे कहलाने लगे 'शिरडी के साईबाबा'।
साईबाबा ने अनगिनत लोगों के कष्टों का निवारण किया। जो भी उनके पास आया, वह कभी निराश होकर नहीं लौटा। वे सबके प्रति समभाव रखते थे। उनके यहां अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जाति-पाति, धर्म-मजहब का कोई भेदभाव नहीं था। समाज के सभी वर्ग के लोग उनके पास आते थे। बाबा ने एक हिंदू द्वारा बनवाई गई पुरानी मसजिद को अपना ठिकाना बनाया और उसको नाम दिया 'द्वारकामाई'। बाबा नित्य भिक्षा लेने जाते थे और बड़ी सादगी के साथ रहते थे। भक्तों को उनमें सब देवताओं के दर्शन होते थे। कुछ दुष्ट लोग बाबा की ख्याति के कारण उनसे ईष्र्या-द्वेष रखते थे और उन्होंने कई षड्यंत्र भी रचे। बाबा सत्य, प्रेम, दया, करुणा की प्रतिमूर्ति थे। साईबाबा के बारे में अधिकांश जानकारी श्रीगोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर द्वारा लिखित 'श्री साई सच्चरित्र' से मिलती है। मराठी में लिखित इस मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। साईनाथ के भक्त इस ग्रंथ का पाठ अनुष्ठान के रूप में करके मनोवांछित फल प्राप्त करते है।
साईबाबा के निर्वाण के कुछ समय पूर्व एक विशेष शकुन हुआ, जो उनके महासमाधि लेने की पूर्व सूचना थी। साईबाबा के पास एक ईट थी, जिसे वे हमेशा अपने साथ रखते थे। बाबा उस पर हाथ टिकाकर बैठते थे और रात में सोते समय उस ईट को तकिये की तरह अपने सिर के नीचे रखते थे। सन् 1918 ई.के सितंबर माह में दशहरे से कुछ दिन पूर्व मसजिद की सफाई करते समय एक भक्त के हाथ से गिरकर वह ईट टूट गई। द्वारकामाई में उपस्थित भक्तगण स्तब्ध रह गए। साईबाबा ने भिक्षा से लौटकर जब उस टूटी हुई ईट को देखा तो वे मुस्कुराकर बोले- 'यह ईट मेरी जीवनसंगिनी थी। अब यह टूट गई है तो समझ लो कि मेरा समय भी पूरा हो गया।' बाबा तब से अपनी महासमाधि की तैयारी करने लगे।
नागपुर के प्रसिद्ध धनी बाबू साहिब बूटी साईबाबा के बड़े भक्त थे। उनके मन में बाबा के आराम से निवास करने हेतु शिरडी में एक अच्छा भवन बनाने की इच्छा उत्पन्न हुई। बाबा ने बूटी साहिब को स्वप्न में एक मंदिर सहित वाड़ा बनाने का आदेश दिया तो उन्होंने तत्काल उसे बनवाना शुरू कर दिया। मंदिर में द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने की योजना थी।
15 अक्टूबर सन् 1918 ई. को विजयादशमी महापर्व के दिन जब बाबा ने सीमोल्लंघन करने की घोषणा की तब भी लोग समझ नहीं पाए कि वे अपने महाप्रयाण का संकेत कर रहे है। महासमाधि के पूर्व साईबाबा ने अपनी अनन्य भक्त श्रीमती लक्ष्मीबाई शिंदे को आशीर्वाद के साथ 9 सिक्के देने के पश्चात कहा- 'मुझे मसजिद में अब अच्छा नहीं लगता है, इसलिए तुम लोग मुझे बूटी के पत्थर वाड़े में ले चलो, जहां मैं आगे सुखपूर्वक रहूंगा।' बाबा ने महानिर्वाण से पूर्व अपने अनन्य भक्त शामा से भी कहा था- 'मैं द्वारकामाई और चावड़ी में रहते-रहते उकता गया हूं। मैं बूटी के वाड़े में जाऊंगा जहां ऊंचे लोग मेरी देखभाल करेगे।' विक्रम संवत् 1975 की विजयादशमी के दिन अपराह्न 2.30 बजे साईबाबा ने महासमाधि ले ली और तब बूटी साहिब द्वारा बनवाया गया वाड़ा (भवन) बन गया उनका समाधि-स्थल। मुरलीधर श्रीकृष्ण के विग्रह की जगह कालांतर में साईबाबा की मूर्ति स्थापित हुई।
महासमाधि लेने से पूर्व साईबाबा ने अपने भक्तों को यह आश्वासन दिया था कि पंचतत्वों से निर्मित उनका शरीर जब इस धरती पर नहीं रहेगा, तब उनकी समाधि भक्तों को संरक्षण प्रदान करेगी। आज तक सभी भक्तजन बाबा के इस कथन की सत्यता का निरंतर अनुभव करते चले आ रहे है। साईबाबा ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने भक्तों को सदा अपनी उपस्थिति का बोध कराया है। उनकी समाधि अत्यन्त जागृत शक्ति-स्थल है।
साईबाबा सदा यह कहते थे- 'सबका मालिक एक'। उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भावना का संदेश देकर सबको प्रेम के साथ मिल-जुल कर रहने को कहा। बाबा ने अपने भक्तों को श्रद्धा और सबूरी (संयम) का पाठ सिखाया। जो भी उनकी शरण में गया उसको उन्होंने अवश्य अपनाया। विजयादशमी उनकी पुण्यतिथि बनकर हमें अपनी बुराइयों (दुर्गुणों) पर विजय पाने के लिए प्रेरित करती है। नित्यलीलालीन साईबाबा आज भी सद्गुरु के रूप में भक्तों को सही राह दिखाते है और उनके कष्टों को दूर करते है। साईनाथ के उपदेशों में संसार के सी धर्मो का सार है। अध्यात्म की ऐसी महान विभूति के बारे में जितना भी लिखा जाए, कम ही होगा। उनकी यश-पताका आज चारों तरफ फहरा रही है। बाबा का 'साई' नाम मुक्ति का महामंत्र बन गया है और शिरडी महातीर्थ।
डॉ.अतुल टण्डन
अवतारी संत
ईंराम किसी दिव्य शक्ति के अवतार ही थे। उनके अलौकिक कृत्यों के कारण कोई उन्हे विट्ठल का अवतार मानता था तो कोई शिव का तो कोई साक्षात् परब्रह्म का। उनके अवतारी पुरुष होने के संबंध में 'शिरडी के साईं' खंड काव्य की ये पंक्तियां द्रष्टव्य है-
द्वापर का ही कृष्ण कहो या राम रहा जो त्रेता का।
शिरडी में साई बन आया
गौरव लिए विजेता का॥
विजित हुए थे पाप-ताप सब त्रसित हुए पापाचारी।
अनुगतों और भक्तों का तो बन आया वह भयहारी॥
इस फकीर से प्रतीत होते व्यक्ति की शक्ति अद्भुत थी। उसने कितने कोढि़यों को काया दी, कितने नि:संतान को संतान दी, कितने को असाध्य आधि-व्याधियों से मुक्ति दी, इसकी गणना नहीं हो सकती। यह कोई कल्पित गाथा नहीं है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है जिसे उस समय के गण्यमान्य व्यक्तियों ने अपनी पुस्तकों तथा अपने आलेखों में अंकित किया। ये सामग्रियां आज भी उपलब्ध है। साई ने असंख्य चमत्कार किए जिनमें एक-दो का उल्लेख ही हम यहां कर पाएंगे।
साई कहां पैदा हुए, कब पैदा हुए, यह कोई नहीं जानता। वह अकस्मात् 16-17 वर्ष के युवक के रूप में शिरडी के एक नीम वृक्ष के नीचे लोगों को दिखाई पड़े थे। मुख से एक ऐसी कान्ति फूटती थी मानो वह एक विलक्षण सिद्ध पुरुष हों। अपनी निरन्तर उपस्थिति से उन्होंने नीम-वृक्ष को भी धन्य कर दिया।
'श्री साईं सच्चरित्र' के अनुसार-
सदा निंबवृक्षस्य मूलाधिवासात्।
सुधास्त्राविणं तिक्तमप्यप्रियं तम्।
तरुं कल्पवृक्षाधिकं साधयन्तम्।
नमामीश्वरं सद्गुरुं साईनाथम्।
मैं सद्गुरु साईनाथ का नमन करता हूं, जिनका सामीप्य पाकर नीम-वृक्ष तिक्त होकर भी सदा अमृत-वर्षण करता है। यह पेड़ कल्पवृक्ष से भी अधिक फलदाई है।
नीम-वृक्ष के नीचे विराजने की पुष्टि इन मोहक काव्य पंक्तियों से भी होती है-
नीम वृक्ष के नीचे ही थी
लगी पालकी बालक की।
वय होगी सोलह-सत्रह की
तेजस्वी भवपालक की॥
साई साम्प्रदायिक सद्भाव के साक्षात् प्रतीक थे। वह हिंदू और मुसलमान दोनों थे। मुलिम वेशभूषा थी, सदा 'अल्लाह मालिक' जपते थे, एक मसजिद को ही अपना आवास बनाया था पर इसे नाम दिया था 'द्वारिका माई'। इसी जगह मुसलमानों का 'उर्स' महोत्सव होता था तो रामनवमी का कार्यक्रम भी क्रियान्वित होता था। निस्संदेह यह सर्वज्ञाता कृष्ण की द्वारिका के महत्व से अच्छी तरह परिचित था जो 'स्कन्द पुराण' में यों वर्णित है-चतुर्वर्णामपि वर्गाणां यत्र द्वाराणि सर्वत:। अतो द्वारावतीत्युक्ता विद्वद्भिस्तत्व वादिभि:॥
चारो वर्णों के लोगों के लिए जिसके द्वार सर्वत्र खुले है उसे ही तत्व ज्ञानी विद्वान द्वारिका कहते हैं।
साईं बाबा की 'द्वारिका माई' के द्वार भी सदा उद्घाटित थे-गरीब-अमीर, साधु-असाधु और हिंदू-मुसलमान सबके लिए।
साईं बाबा इस मसजिद को नित्य संध्या दीपों से सजाते थे जिसके लिए वह आस-पास के दुकानों से तेल मांगते थे। एक दिन दुकानदारों ने निश्चय किया कि अब मुफ्त में तेल नहीं देंगे। साईं ने सभी मिट्टी के दीयों में तेल के बदले पानी भर दिया। दीप जल उठे और मसजिद रात भर प्रकाश से जगमग करती रही। दुकानदारों की आंखें खुल गई।
एक बार शिरडी में हैजे का घोर प्रकोप हुआ। साई बैठकर चक्की में गेहूं पीसने लगे। यह देखकर कई लोग उपस्थित हो गए। चार औरतों ने चक्की लेकर स्वयं पीसना शुरू किया। पर्याप्त आटा हो गया तो साई ने उसे गांव की सीमाओं पर छिड़कवा दिया। हैजा गायब। लोगों को लग गया कि बाबा ने गेहूं के रूप में हैजे को ही पीस डाला।
शिरडी को 'उदी' (धूनी का भस्म) की महिमा तो न्यारी है। सहस्रों किलोमीटर दूर भी इनके भक्त इस 'उदी' के द्वारा रोगों और संकटों से मुक्त हो जाते है। यह सत्य है कि कई पूर्णरूपेण समर्पित भक्तों के यहां बाबा के चित्रों से उदी झड़ती है।
शिरडी आने वाले लोगों की संख्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है। नवरात्र एवं निर्वाणोत्सव पर तो दर्शन में कई-कई दिन लग जाते है।
शिरडी आज देश के प्रमुख तीन-चार तीर्थों में एक है।

भारतीय एकता संगठन इलाहाबाद

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